कवियों और लेखकों की लेखनी से ही किसी देश की भाषा समृद्ध होती है। देश की भावी पीढ़ी को संस्कार मिलते है। बनारसी दास हिन्दी साहित्य के उन महान कवियों में शुमार किये जाते हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं से देश, समाज, धर्म और व्यक्ति के अंतर्मन को पटल पर खोल कर रख दिया। उनकी कृति अर्धक थानक' भारतीय साहित्य की पहली आत्मकथा मानी जाती है

बनारसी दास का जीवन परिचय

बनारसी दास का जन्म 1586 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के जौनपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम नन्ददास था। पिता व्यापार करते थे। एक प्रसिद्ध ब्यापारी परिवार में जन्म होने के बाद भी बनारसी दास का रुझान साहित्य और लेखन की ओर था। ब्यापार में असफलता, जीवन में दुख-सुख, पारखारिक संकट ने उन्हें अपनी आत्मकथा लिखने की प्रेरणा दी। उनकी आत्म कथा मै उनके जीवन की झलक स्पष्ट दृष्टि गोचर होती है।

अर्धकथानक - हिन्दी साहित्य की पहली आत्मकथा

प्रमुख कृति 'अर्द्धकथानक' की रचना बनारसी दास ने 1641 ई में की थी। इसमें उनके जीवन के 55 वर्ष तक की आयु का ही वृतान्त है। इसलिये इस कृति को अर्धक थानक कहा जाता है। किसी लेखक के द्वारा लिखी खुद की आत्मकथा, यह पहली आत्म- कथा मानी जाती है।

कृति 'अर्थक थानक' में लेखक ने अपने 55 वर्ष की आयु तक  के जीवन का सम्पूर्ण वृतान्त उकेरा है। इसमें उन्होंने अपने दुख-सुख, सफलता असफलता, मोह-त्याग का सजीव चित्रण किया है। जिसके कारण उन्हें अन्य कवियों से अलग बनाती हैं। 

भाषाशैली

अपनी कृति में उन्होंने ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। अलंकरण शब्दों से बचते हुये उन्होने सहज, सरल सहज ब्रज भाषा को अपनाया है। जैन परिवार में जन्म लेने के कारण अहिंसा, अपरिग्रह, आत्मसंयम जैसे सिद्धान्त उनके जीवन और रचना में स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। उन्होंने Realistic tone को अपनाया। भाषा में कही कही spiritual depth दिखाई पड़ती है। जो जैन धर्म से गहरे सम्बन्ध दर्शाती है।

जैन धर्म और बनारसी दास

जैन धर्म से ताल्लुक रखने के कारण उनका जीवन धर्म से गहराई से जुड़ा था। उन्होंने बताया कि धर्म बाहरी आडम्बरो तक सीमित न होकर आत्म प्रशास्त का माध्यम होना चाहिये। वे जैन धर्म की कठोर परम्पराओं से भी असंतुष्ट रहे थे। अंतः आत्म चिन्तन के माध्यम से और कठोर साधना के कारण उन्होंने spiritual Peace प्राप्त की |

साहित्य में योगदान

बनारसी दास ने 'अर्द्धक थानक' के अलावा भी अन्य कई रचनाएँ की है। जो निम्न है-

* मोक्ष मार्ग प्रकाशक

* रस मंजरी

* संतवाणी

* समयसार नाटक

इन ग्रंथों में उन्होने मनुष्य की  प्रवृत्ति, आदर्श मूल्य, और धर्म की ब्याख्या की है। वे एक साहित्यक और गहरी विचारधारा रखते थे, उनकी कृतियों से परिलक्षित होता है।

अर्द्धक थानक का सामाजिक दृष्टिकोण

उस समय मुगलकाल चल रहा था। मुगलों का भारत पर शासन था। समाज में आर्थिक और अन्य धर्मो, मुगलों को छोड़कर, मानने वालों के सामने समस्याएं थी। जिससे उल्लेख उन्होंने अपने कथानक में किया है | अपने 'अर्द्ध कथानक' उन्होंने कभी धर्म की तो कभी आत्मज्ञान की चर्चा की है। उनकी रचना बताती है कि मानवीयक कसमकस हर युग में रही है चाहे वो सोलहवी सदी हो या फिर आजका युग |

आत्मकथा की चेतना

बनारसी दास ने अर्द्ध कथानक पूरी ईमानदारी के साथ लिखी है। उन्होंने इसमें अपनी असफलताओं का जिक्र भी पूरे विस्तार के साथ किया है। अपने  द्वारा की गई गलतियों को भी स्वीकारा, लेकिन गलतियों से सीख भी ली। ईमानदारी से उनकी आत्मकथा को Psychological depth मिली। यही आधुनिक Autobiographical Writing की नीव बनी।

साहित्यक महत्व में बनारसी दास

बनारसी दास ने अपने लेखन से सिद्ध  किया कि साहित्य वास्तविक जीवन के अनुभवों में भी महत्वपूर्ण है। साहित्य समाज, धर्म और व्यक्ति के आत्मबोध को समझने में सहायक होता है। History में उन्हें हिन्दी साहित्य का पुल कहा जाता है। 

निष्कर्ष

हिन्दी साहित्य के बनारसी दास ऐसे रचनाकर है जो आज के समय पर भी उनकी रचनाएँ प्रासंगिक है। उनकी रचना style, ईमानदारी, Philosophical depth उन्हें अपने  समकालीन कवियो से अलग बनाती है। अपने जीवन के संघर्षों आध्यात्मिक खोज को सहजता से अपनी रचना में डाला है 'अर्द्धक थानक ' बनारसी दास की ही रचना न होकर उस हर इंसान की  कहानी है जो सही मायने में जीवन के अर्थ की तलाश में है। तभी तो बनारसी दास को pioneer of हिंदी autobiography और हिन्दी साहित्य का वास्तविक कवि कहा जाता है।