जब जब देश में कोई पुलिस एनकाउंटर होता है, तब-तब एनकाउंटर से जुड़े मामलों पर बहस होती रहती है। ऐसी परिस्थिति में जब व्यक्ति को मानसिक रूप से अ- स्वस्थ या विक्षिप्त बताया जाय और उसी व्यक्ति की पुलिस मुठ भेड़ में मौत हो जाय तो सवाल तो स्वाभाविक रूप से उठेंगे ही। इसी प्रकार के एक मामले में भरत तिवारी की मौत के बाद न्यायिक जाँच की मांग तुल पकड़ रही है। मामला एक व्यक्ति की मौत तक सीमित न होकर कानून, मानवाधिकार और पुलिस कार्यवाही की पारदर्शिता से जुड़ गया है। 

भरत तिवारी कौन थे?

भरत तिवारी के बारे में स्थानीय स्तर पर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि भरत तिवारी मानसिक रूप से अस्वस्थ था और उसका व्यवहार असामान्य था। वही, कुछ लोगों ने इन दावों पर सवाल खडे किए हैं। ऐसी परिस्थितियों में किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति का निर्धारण केवल चिकित्सीय रिकार्ड और विशेषज्ञों  राय पर आधारित होता है। अत: मामले में उपलब्ध तथ्यों की निष्पक्ष जाँच आवश्यक मानी जा रही है

एनकाउन्टर के बाद सवाल क्यों उठे

भरत तिवारी की मौत के बाद सवाल उठा कि यदि उन्हें पहले मानसिक रूप से अस्थिर बताया जा रहा था तो उन्हें नियंत्रित करने के लिये अन्य वैकल्पिक उपाय भी अपनाए जा सकते थे। क्या स्थिति ऐसी बनी कि घातक बल प्रयोग आवश्यक हो गया या कोई दूसरा रास्ता संभव था। इन सवालों के जवाब विस्तृत जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही मिल सकते हैं। 

न्यायिक जांच का महत्व 

न्यायिक जांच का महत्व किसी पक्ष को दोषी ठहराना न होकर तथ्यों का निष्पक्ष परीक्षण करना होता है। इसमें घटना स्थल प्रत्यक्ष दर्शीयों के बयान, पुलिस रिकार्ड, फॉरेन्सिक रिपोर्ट, पोस्टमार्डम रिपोर्ट एवं अन्य सम्बन्धित दस्तावेजों का विश्लेषण किया जाता है। घटना होने की परिस्थिति एवं सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है।

कानून व्यवस्था और मानसिक स्वास्थ्य

किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य की पहले से जानकारी हो तो ऐसी स्थिति में कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों के सामने चुनौती और भी़ बढ़ जाती है। देखा जाता है कि मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति कई बार अप्रत्याशित व्यवहार कर सकता है। ऐसे में स्थित जटिल हो जाती है।

विशेषज्ञ मानते है कि इस तरह के मामलों में पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन के बेहतर तालमेल से गम्भीर घटनाओं को टाला जा सकता है। इसके साथ ही पुलिस कर्मियों को मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी परिस्थियों से निबटने हेतु विशेष प्रशिक्षण आवश्यक है

मानवाधिकार और पुलिस जिम्मेदारी

प्रत्येक नागरिक को कानून के अन्तर्गत जीवन जीने और निष्पक्ष न्याय का अधिकार प्राप्त है। वहीं पुलिस की जिम्मेदारी कानून व्यवस्था बनाए रखना और आपात स्थिति में उचित कार्रवाई करना है। अतः किसी विवादित मुठभेड़ में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो जिससे पीडित को न्याय मिले और पुलिस व्यवस्था पर जनता का विश्वास बढ़े। 

सरकार से परिवार और समाज की अपेक्षाएं

ऐसे मामलों में पीड़ित परिवार निष्पक्ष जांच की मांग करते हैं। यदि जाँच में किसी प्रकार की लापरवाही या, नियमों के उलंघन का मामला सामने आता है तो सम्बन्धित अधिकरियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही  की जा सकती है। वहीं कार्यवाही सही पाई जाती है तो जांच उसके सम्बन्ध में स्पष्टता प्रदान करती है।

न्यायिक जांच से उम्मीदें

भरत तिवारी के सम्बन्ध मे

* उपलब्ध साक्ष्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन

* पुलिस कार्यवाही की वैधानिक जांच 

* घटना  की वास्तविक परिस्थितयों का पता लगाना 

* मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े दावों का परीक्षण

* भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम को आवश्यक सुझाव

निष्कर्ष

भरत तिवारी मामले में मानसिक स्वास्थ्य, पुलिस कार्यवाही, मानवाधिकार और न्यायिक पारिदर्शिता को आगे रखकर सच्चाई तक पहुंच कर जो भी निष्कर्ष होंगे, विधि सम्मत होंगे