Table of Contents
- 1. महगाई - आर्थिक सूचकांक से राजनैतिक मुद्दा तक
- 2. बेरोजगारी - युवा जन संख्या और राजनैतिक प्रेशर
- 3. महगाई एवं बेरोजगारी का संयुक्त प्रभाव
- 4. केन्द्र और राज्य राजनीति पर असर
- 5. वैश्विक कारक एवं घरेलू राजनीति
- 6. दीर्घकालिक राजनैतिक प्रभाव
- 7. चुनावी रणनीति और जन सम्पर्क
- 8. मीडिया और सार्वजनिक बहस
- * समाचार चैनलों द्वारा मूल्य वृद्धि पर बहस
- 9. हाल के वर्षों की प्रवृत्ति
- निष्कर्ष
नीति जनमत, चुनाव के संदर्भ हो भारत के परिदृश्य में महगाई और बेरोजगारी एक आर्थिक संकेतक हीन होकर यह राजनैतिक विमर्श और चुनावी व्यवहार एवं नीति निर्माण को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। जब रोज मर्रा के वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं और रोजगार के अवसर सीमित होते हैं तो इसका बुरा असर नागरिकों के जीवन पर पड़ता है। यही असर मत पेटी तक पहुँचता है। इस लेख के माध्यम से महगाई और बेरोजगारी के राजनैतिक प्रभाव का तथ्यात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करेंगे।
1. महगाई - आर्थिक सूचकांक से राजनैतिक मुद्दा तक
A - महगाई
वस्तुओं एंव सेवाओं की कीमत में निरंतर वृद्धि ही महगाई है। भारत के संदर्भ में इसे कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) एंव होल सेल प्राइस इंडेक्स (WPI) के आधार पर मापते हैं।
जब CPI बढ़ता है तो आम उपभोक्ता की क्रय शक्ति घटती है।
B - राजनैतिक प्रभाव
* ईधन, रसोई गैस के एवं खाद्य पदार्थो के दाम बढ़ने पर सरकार को सार्वजनिक आलोचना का सामना करना पड़ता है।
* विपक्षी दलों द्वारा इसे कॉस्ट ऑफ लिविंग क्राइसिस के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
* सरकार सब्सिडी, कर कटौती आदि के माध्यम से जनता को राहत देने का प्रयत्न करती है।
2. बेरोजगारी - युवा जन संख्या और राजनैतिक प्रेशर
A - बेरोजगारी की स्थिति
भारत विश्व का सर्वाधिक युवा आबादी वाला देश है।
* Unemployment Rate
* Labour Force Participation (LFPR)
जैसे संकेतक नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण है।
B - राजनैतिक प्रभाव
बेरोजगारी मुद्दा विशेषकर -
* ग्रामीण श्रमिक वर्ग को
* शहरी मध्यम वर्ग को
* प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवा वर्ग को प्रभावित करता है।
C - राजनैतिक दल अपने चुनावी मैनीफैस्टो में
* सरकारी नौकरियों की भर्ती
* MSMB ग्रोथ
* स्टार्ट - अप सपोर्ट
* स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम
जैसी घोषणाएं शामिल करते है
3. महगाई एवं बेरोजगारी का संयुक्त प्रभाव
जब महंगाई और बेरोजगारी उच्च स्तर पर होते है तो अर्थशास्त्री इसे Economic Distress कहते हैं।
ऐसी अवस्था में -
* खर्च बढ़ता है।
* बचत घटती है।
* आय स्थिर या कम होती है।
इससे राजनैतिक असंतोष पनपता है।
4. केन्द्र और राज्य राजनीति पर असर
महंगाई और रोजगार का विषय भारत की सेन्टर- स्टेट रिलेशन से भी जुड़ा है।
* ईधन पर कर संरचना
* सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS)
* राज्य स्तर पर रोजगार योजनाएं
5. वैश्विक कारक एवं घरेलू राजनीति
* अन्तराष्ट्रीय तेल कीमतें
* वैश्विक मंदी
* सप्लाई चेन में व्यवधान
6. दीर्घकालिक राजनैतिक प्रभाव
* युवा केन्द्रित राजनीति का उभार
* आर्थिक आत्मनिर्भरता पर जोर
* पॉलिसी सुधार की मांग
* सामाजिक कल्याण योजना का विस्तार
7. चुनावी रणनीति और जन सम्पर्क
A - प्रत्यक्ष लाभ योजनाएं
* डायरेक्ट बैनी फिट ट्रांसफर
* सब्सिडी स्कीम
* फ्री Ration प्रोग्राम का उपयोग
B - रोजगार अभियान
* Mega Recruitment Drives
* इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स
* सेल्फ एम्प्लॉयमेंट स्कीम
8. मीडिया और सार्वजनिक बहस
* समाचार चैनलों द्वारा मूल्य वृद्धि पर बहस
* सोशल मीडिया पर रोजगार से जुड़ी शिकायतों का वायरल होना।
9. हाल के वर्षों की प्रवृत्ति
* खाने-पीने की वस्तुओं पर महंगाई एव ईधन कीमतों पर बहस
* रोजगार डाटा और परीक्षा भर्ती से जुड़े प्रश्न
* स्टार्टअप इकोसिस्टम और डिजिटल इकोनॉमी
निष्कर्ष
भारत के संदर्भ में महंगाई और बेरोजगारी आर्थिक चुनौती ही नही अपितु लोकतांत्रिक जबाब देही भी है। जनता सरकार से समाधान की अपेक्षा करती है। सरकार को-
* एक तरफ प्रभावी नीतियों से जन समर्थन प्राप्त करना
* दूसरी तरफ असंतोष को संभालना होता है।