चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक भू राजनीति के शक्ति संतुलन को एक हद तक अस्थिर कर दिया है। यह तनाव विश्व के power balance, global economy, security architecture और future world order को प्रभावित करता हुआ दिखाई देता है। यह लेख प्रमाणित तथ्यो पर आधारित है।
दो महा शक्ति - दो देश, दो अलग रास्ते।-
अमेरिका सन 1945 के बाद से ही ग्लोबल सुपर पॉवर बना हुआ है।
* डालर आधारित विश्व की इकोनोमी बनी हुई है।
* वर्ल्ड बैंक, नाटो, IMF जैसी वैश्विक संस्थाओं में दबदबा।
* मिलिट्री Presence एकोस कांटीनेन्ट्स।
* चाइना में 1998 के बाद आर्थिक उभार की गति तेज देखी गयी।
* विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था।
* विश्व का मैन्युफैक्चरिग हव
* बेल्ट एण्ड रोड़ Initiative के तहत ग्लोबल एम्स पेंसन।
अब सवाल खड़ा होता है - अमेरिका चीन को रोकना चाहता है या चीन अमेरिका को चुनौती दे रहा है। अमेरिकी चीन तनाव की असली वजह।
गत 30-40 वर्षों से चीन की अर्थव्यवस्था जिस तेजी के साथ बड़ी है उससे वह अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सीधे चुनौती देता दिखाई पड़ता है। जिससे-
* ट्रेड सरप्लस
* मैन्युफैक्चरिंग कन्ट्रोल
* सप्लाई चैन डोमीनेन्स
* टैरिफ
* टच बैस
* ट्रेड Restrictions जैसे कदम सामने आये। ये सब अर्थ व्यवस्था कन्ट्रोल के प्रतिफल थे।
आज के युद्ध का मतलब आर्थिक और तकनीकी है। जिधऱ मजबूत अर्थव्यवस्था और तकनीकी है वही ताकतवर है।
* सेमी कन्डक्टर चिप
* आर्टिफिशियल इन्टेलीजेंस
* क्वान्टम कम्प्यूटिंग
* Huawei
हालांकि अमेरिका वन चाइना पालिसी को मानता है परन्तु ताइवान को मिलिट्री और राजनैतिक सपोर्ट भी देता है। आयात निर्यात में भी सहूलियत देता है। जबकि चीन ताइवान को अपना ही हिस्सा मानता है।
यह वैश्विक व्यापार का हिस्सा है। परन्तु ताइवन को, मिलिट्री लोकेशन में चीन यह दबदबा बढ़ा रहा है। इसी से इन्डोपैसेफिक स्ट्रेटजी और क्वाड जैसी संस्थाओं का जन्म हुआ।
तनाव शक्ति का ही नही बल्कि सिस्टम का भी है। अमेरिका में लिबरल डेमोक्रेसी है। जबकि चीन में वन पार्टी सोसलिस्ट तंत्र है। दोनो एक-दूसरे को मूल्यो, गवर्नेन्स मॉडल, मानवाधिकारों पर चुनौती देते दिखाई देते हैं।
1991 के अमेरिका पावर में पूरी तरह से था। आज के समय में रुस, चीन, भारत भी उभर रहे है। आज छोटे और मध्यम देश सुरक्षा के लिये अमेरिका और अर्थव्यवस्था के लिए अपने लिये चीन को चुनते हैं।
UN, WTO,WHO पर चीन और अमेरिका में खीचा तान अक्सर दिखाई देती है। जिसकी वजह से निर्णय क्षमता और एक राय बनाना इन संस्थानों के लिये मुश्किल हो रहा है।
भारत इसमें वैलेसिग पावर की तरह है। भारत कवाड का हिस्सा भी है, किसी कैम्प में पूरी तरह भी नही है। चीन के साथ बार्डर टेशन भी है, राष्ट्रीय हितो को प्राथमिकता पर रखता है। अमेरिका कास्ट्रे जिंक पार्टनर है, Multi-alignment पॉलिसी भी रखता है।
विशेषज्ञों का मानना है सीधे युद्ध की संभावना कम ही है। आर्थिक, तकनीकी बार की संभावना ज्यादा है।
1- कंट्रोल्ड कम्पटीशन, कोल्डवार, regional conflicts (ताइवान, साउथ चाइना-सी) आर्थिक वार की संभावना है।
कौन नियम बनायेगा, कौन अर्थव्यवस्था चलाएगा आदि इसके नतीजे तय करेंगे।